नित्य संदेश ब्यूरो
मेरठ। फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ एक उत्कृष्ट पत्रकार,कवि और लेखक थे, लेकिन उनकी पत्रकारिता सेवाओं को प्रकाश में नहीं लाया गया है। वर्तमान में कुरान के सैकड़ों अनुवाद हैं। फैज़ ने भी अनुवाद किया, हालाँकि उनके दोस्तों ने उन्हें अनुवाद करने से मना किया था, उन्होंने बहुत ही सुंदर अनुवाद किया। फैज़ की अस्सी नज़्में और सत्तर ग़ज़लें हैं। उनके शब्द कम हैं, आज के दौर में भी उनके मायने हैं। यह कहना था कनाडा के मशहूर शोधकर्ता और आलोचक डॉ. सैयद तकी आबिदी का, जो चौधरी चरण सिंह यूनिवर्सिटी के उर्दू विभाग और इंटरनेशनल यंग उर्दू स्कॉलर्स एसोसिएशन की ओर से आयोजित 'आधुनिक दौर में फैज अहमद फैज के मायने' कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के तौर पर बोल रहे थे।
उन्होंने कहा कि फैज के निधन को चालीस साल बीत चुके हैं, लेकिन आज भी फैज पर कई कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। फैज की वाणी और शैली बिल्कुल अनूठी और महत्वपूर्ण है। फ़ैज़ की शायरी की शैली अन्य सभी शायरों से अलग है। फैज़ ने उपमहाद्वीप में पांच सौ साल के उत्पीड़न और दमन को अपनी शायरी में पेश किया। नए अनुभव और गहरी नज़र फ़ैज़ की शायरी का अहम हिस्सा हैं। फ़ैज़, इक़बाल, जोश आदि शायरी के शायर हैं, लेकिन यह भी सच है कि वे ग़ज़ल भी लिख सकते थे। छोटी शायरी में भी फ़ैज़ इतने लोकप्रिय क्यों हैं? चालीस वर्ष बाद भी उनकी कविताओं की खुशबू और ग़ज़लों की खूबियाँ उन्हें विशेष ख्याति दिलाती हैं। कार्यक्रम की शुरुआत सईद अहमद सहारनपुरी ने पवित्र कुरान की तिलावत से हुई। कार्यक्रम की अध्यक्षता अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग के पूर्व अध्यक्ष एवं प्रसिद्ध आलोचक प्रोफेसर सगीर अफ्राहीम ने की। कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि वर्तमान युग के प्रसिद्ध आलोचक प्रोफेसर कुद्दुस जावेद (पूर्व उर्दू विभागाध्यक्ष कश्मीर विश्वविद्यालय, कश्मीर) थे, विभाग की शोध छात्रा सैयदा मरियम इलाही ने अपना शोध पत्र "फैज़ की कविताओं में शैली और बौद्धिक प्रतिरोध” प्रस्तुत किया। कार्यक्रम में वक्ता के रूप में प्रोफेसर रेशमा परवीन (अध्यक्ष आयुसा) ऑनलाइन मौजूद रहीं। स्वागत भाषण शोध छात्र मुहम्मद हारून ने, संचालन जम्मू-कश्मीर से इरफान आरिफ ने तथा धन्यवाद ज्ञापन एम.ए. उर्दू के द्वितीय वर्ष के छात्र मुहम्मद अरशद ने किया। कार्यक्रम में डॉ. आसिफ अली, डॉ. शादाब अलीम, फरहत अख्तर, मुहम्मद नदीम, मुहम्मद शमशाद एवं छात्र-छात्राएं शामिल थे।
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