नित्य संदेश। पुराने दौर में राजा के दरबार में एक खास कुर्सी होती थी—सिंहासन। उस पर बैठने वाले के पास न केवल सत्ता होती थी, बल्कि निर्णय लेने की शक्ति भी। पर अब समय बदल गया है। सत्ता वही है, पर कुर्सी का डिज़ाइन बदल गया है। अब कुर्सी पर कोई भी बैठ सकता है, बशर्ते उसे खुद से ज्यादा उस कुर्सी को चलाने वाले हाथों पर भरोसा हो।
बीजेपी ने एक नया ट्रेंड सेट किया है—भारतीय राजनीति में सत्ता परिवर्तन कोई नई बात नहीं, लेकिन बीजेपी ने मुख्यमंत्री चयन की एक नई परंपरा शुरू कर दी है—अनुभवी नेताओं को किनारे कर, नए चेहरों को आगे लाने की। राजस्थान, मध्य प्रदेश और अब दिल्ली में भी यही रणनीति अपनाई गई है। यह बदलाव केवल व्यक्तियों का नहीं, बल्कि सत्ता संचालन के तरीके का भी है। नया चेहरा आता है , नाम नया, लेकिन विचार वही जो 'सिस्टम' चाहता है। यह सिस्टम तय करता है कि नया मुख्यमंत्री कब बोलेगा, कब चुप रहेगा, और किसकी जय बोलेगा।
नए नेता मुख्यमंत्री : अपडेटेड लेकिन कंट्रोल्ड
नए मुख्यमंत्री पुराने मुख्यमंत्री से ज्यादा आज्ञाकारी होते हैं। वे निर्णय नहीं लेते, निर्णय उनके लिए लिए जाते हैं। वे बोलते हैं, लेकिन शब्द उनके नहीं होते। वे जनता के सामने तो होते हैं, लेकिन जनता के लिए नहीं, बल्कि नेतृत्व के लिए होते हैं।
अगर आप सोचते हैं कि नया मुख्यमंत्री नया बदलाव लाएगा, तो यह वैसा ही है जैसे किसी सरकारी दफ्तर में नई फाइल आ जाए, लेकिन मंजूरी की आखिरी मुहर वही पुरानी हो।
'लड़ाकू घोड़े' नहीं, 'मैनेज होने वाले मोहरे'
एक जमाना था जब मुख्यमंत्री अपने फैसले खुद लेते थे। अब वे फैसले लेने के बजाय "फॉरवर्ड" करने लगे हैं—ठीक वैसे ही जैसे हम व्हाट्सएप मैसेज बिना सोचे-समझे आगे भेज देते हैं। उनका खुद का कोई मत नहीं होता, बल्कि वे अपने शीर्ष नेतृत्व के विचारों का ही प्रतिबिंब होते हैं।
वे उन कठपुतलियों की तरह हैं जिनकी डोरें मंच के पीछे से खींची जाती हैं। वे जनता के बीच मुस्कुराते हैं, नारे लगाते हैं, और भाषण देते हैं, लेकिन उनकी असली स्क्रिप्ट कहीं और लिखी जाती है।
मंच वही, कलाकार बदलते रहते हैं
यह राजनीति का एक नया मॉडल है—मुख्यमंत्री आते-जाते रहते हैं, लेकिन सत्ता का असली केंद्र वही रहता है। जनता को नए चेहरे दिए जाते हैं, ताकि वह यह सोच सके कि बदलाव हो रहा है, जबकि असल में सत्ता की कमान उन्हीं हाथों में रहती है जो पर्दे के पीछे से खेल को नियंत्रित करते हैं।
इस नए दौर में मुख्यमंत्री राजा नहीं, बल्कि वायसराय की तरह होते हैं—शासन करते हैं, लेकिन सत्ता उनके पास नहीं होती। वे बस आदेशों का पालन करते हैं, और यही उनकी सबसे बड़ी योग्यता होती है।
अगर मुख्यमंत्री चुनने की यह प्रक्रिया जारी रही, तो आने वाले वर्षों में हमें और भी ज्यादा "नए" मुख्यमंत्री देखने को मिलेंगे—बिना पहचान, बिना व्यक्तित्व, और बिना अपने विचारों के। वे बस एक नाम होंगे, एक पद पर बैठने वाली मूर्ति, जिसे हर कुछ वर्षों में बदल दिया जाएगा।
पर असली सवाल यह है—क्या जनता भी इसे समझेगी, या फिर हर बार एक नए चेहरे को देखकर यही सोचेगी कि शायद इस बार कुछ बदलेगा?
कुछ बड़े सवाल :
क्या लोकतंत्र में मुख्यमंत्री की भूमिका कमजोर हो रही है?
क्या जनता को वास्तव में नए चेहरों से कोई फर्क पड़ता है?
क्या यह रणनीति बीजेपी को राज्यों में स्थिरता दिलाने में मदद करती है?
क्या विपक्षी दल भी इस मॉडल को अपनाने की कोशिश कर रहे हैं या भविष्य में करेंगे ?
लेखक
डॉक्टर रवीन्द्र राणा
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